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الخميس، 31 يناير، 2013

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هكذا  عرف  أحمد   لماذا  كل هذا الغمووض   يحاصرها   وتذكر حين كان  ينظر الى  عيناها   كان يرى ما لا يستطيع   وصفه  لكنه  اليوم نادم على وصفها بالخيانه   في  الوقت الذي كانت تجازف  بحياتها  كلها
لأجل من
ومن هي
فلسطين
أمي وأمها 

انهمر أحمد  في دموعه التي استوقفها حين  سمع

-  هي سامحتك...!   قالها جدها 

اتكأ   أحمد  على نفسه  وقد  صمت  قليلاً   .. حتى  قال له الجد :
-  لا وقت لديك   .. فضريحها   سنشيعه  عقب صلاة الجمعه  

استجمع أحمد  قواااه  ...  وهو لا يكاد  يصدق  أهي فعلاً  غادرت  تلك الحياة  ...!
ليحملها جثة  هامدة  ...!


وبعد   صلاة  الجمعه    .. تم تشييع جنازتها   فكان  النعش  يتسابق  وكأنه يعرف طريقه    نحو  الضريح   بكى أحمد  بعمق   وقال في نفسه 
-  حتى وانتِ ميته  تتسابقين   لأن  تكوني الأولى حبيبتي.....


بقي    أحمد  عنده يحدثها عن نفسه  ويطلب منها أن تسامحه   التفت  حوله   فكان الجميع قد غادر 
ولكنه  سمعها تهمس في أذنه :

خلي  بالك  من حالك  وكن بخير لأكون بخير عزيزي...!

نظر حوله  وقال :
- أجئتِ  ...؟!

ولكنه لم يتلق جواباً   فعلم  أنه يهذي  ...


هكذا هم الفرسان وقت  الموت نجدهم  ماتوا فقط  فرسااااان ...



أوقات  سعيدة  برفقة  روايتي  

شكراً 

والى اللقاء
بقلمي أنا   فارسه   بلا جواد.

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